कोरोना काल मेें कला और कलाकार

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जरूरत है मनुष्य बन कर मनुष्य के साथ खड़े होने की, पीडि़तों की मदद करने की


यह दोबारा ही नहीं, दुगना मजबूत होकर लौटा है। खबरों से निकल कर कोरोना संकट अब हमारे घरों में दस्तक देने लगा है। ऐसे में हौसला बनाए रखना जितना कठिन है, उतना ही अनिवार्य भी। यह हौसला धैर्य ही दे सकता है, जो किसी भी कलाकार की पूंजी होती है। दुनिया की सबसे खूबसूरत प्रस्तर प्रतिमाओं में शुमार की जाने वाली यक्षिणी के संदर्भ में कवि विनय कुमार की पंक्तियां गौरतलब हैं, ‘कला मांगती है

धैर्य, राई भी रचनी हो तो पहाड़ सा। अधीर शिल्पी एक सिलबट्टा भी नहीं रच सकता’। वाकई धैर्य के बगैर कला संभव ही नहीं, एक-एक आलाप के लिए वर्षों की साधना बगैर धैर्य के हो ही नहीं सकती। मिथिला पेंटिंग की लकीरों को देखें, चकित करती हैं। गांवों में मेहनत मजदूरी करते कलाकारों का धैर्य देखकर आश्चर्य होता है, किस तरह लाखों महीन लकीरों को एक समान दूरी में खींच कर वे विलक्षण आकृति गढ़ लेते हैं। आज किसी भी कलाकर्म के लिए स्थितियां अनुकूल नहीं। न तो समाज उसकी स्वीकार्यता के लिए तैयार है, न ही हम स्वयं शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हैं। ऐसे में अपने धैर्य की पूंजी को जागृत करने की आवश्यकता बढ़ गई है, ताकि इस संकट के समय में कलाकार अपने को किसी सार्थक भूमिका के लिए तैयार कर सकें। हम कलाकार बन कर स्थितियां अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकते, आज जरूरत है मनुष्य बन कर मनुष्य के साथ खड़े होने की, जिस समाज ने हमें अपने से ऊंचा मंच दिया, उसके साथ खड़े होने की।

महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि कलाकार कर क्या सकते हैं, महत्त्वपूर्ण है कि कलाकार कर क्या रहे हैं। उल्लेखनीय है कि दिल्ली के कई कलाकार समूह में सोशल साइट से संपर्क कर व्यापक रूप से जरूरतमंदों को ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहयोग कर रहे हैं। पटना में कई कलाकारों ने जरूरतमंदों के घर पर पका हुआ भोजन पहुंचाने की जवाबदेही उठाई है। मिथिला पेंटिंग के कलाकार बीते वर्ष से ही मास्क बनाने और उसे लोकप्रिय बनाने में सक्रिय हैं। निश्चित रूप से ऐसी ही भूमिका और भी स्थानों पर कलाकार निभा रहे होंगे। यही समय की जरूरत भी है। आज धैर्य के साथ खड़े होना ही, सबसे बड़ा संबल बन सकता है।

 

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